पंडित जी ने मेरी चुदाई की


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दूसरा भाग:
पंडितजी यानि की जानू और मैं रानी, दोनों रातों रात भाग कर दुसरे शहर आ गए. पर मेरी बुरी किस्मत ने मेरा साथ यहाँ भी नहीं छोड़ा. पंडितजी की पंडिताई नहीं चल रही थी और मुझे तो जैसे आग ही लगी हुई थी. रात रात भर चुदने के बाद भी और भी चुदने का मन करता था. एक बार सपने में मैंने इनके यजमान के साथ चुदाई का सपना देखा. सुबह तो बड़ा मन ख़राब हुआ पर बाद में मैंने खूब सोच विचार किया.
“ऐ जी, आपकी पंडिताई तो चल नहीं रही है, तो एक बात बोलूँ.”
“कहो” दुखी मन से जानू ने जवाब दिया.
“कल रात में मैंने देखा की आपके तीसरे वाले यजमान पूजा के साथ मेरी भी पूजा कर रहे थे”
“क्या मतलब है तुम्हारा”
“मतलब यही कि आपकी पंडिताई नहीं चल रही है तो मैं ही हाथ बंटा दूं.”
इशारों इशारों में मैंने पंडितजी को मेरा भडवा बनने को कह दिया.

पंडित जी ये सुनते ही भन्नाते हुए घर से निकल गए”
मैं अकेली घर में अपने आप को कोसने लगी कि क्यों मैंने ऐसा कह दिया. मन कर रहा था कि अपनी चूत में आग लगा दूं. साली यही चूत ही सब जंजालों की जड़ है. न ये चूत होती न ही हम लोग यहाँ आते और न ही ऐसी वैसी बात होती.
पंडितजी शाम तक नहीं आये. मैंने दिन का खाना बना कर भी नहीं खाया. और रात का खाना बनाने की हिम्मत नहीं हुई.
पंडित जी की राह देखते देखते ८ बज गए. तरह तरह के बुरे ख्याल आने लगे दिल में. कहाँ होंगे, कैसे होंगे. इतना तो मैंने अपने पहले पति के लिए भी नहीं सोचा था.
तभी देखा की पंडितजी दूर से आ रहे हैं और साथ में कोई यजमान भी है. चलो इनका मूड तो ठीक हुआ, और एक ग्राहक भी मिल गया. कल परसों का खर्चा चल जायेगा.

“रानी इनसे मिलो, ये हैं रमेश जी”
यह सुनते ही मैं चौकन्ना हो गयी. पंडितजी कभी भी किसी के सामने मुझे रानी नहीं कहते. रानी वो तभी कहते जब हम अकेले हों और हम दोनों चुदास हो रहे हों.
खैर मैंने मुस्कुरा कर नमस्ते कहा.
“मैंने घर से निकलने के बाद बहुत सोचा तुम्हारी बात को”
“फिर”
“फिर क्या, अब इनको ले कर जाओ”
ये सुनके मेरी बांछें खिल गयी. पंडितजी ने उधर दरवाजा लगाया और मैं रमेश को ले कर अन्दर कमरे में ले गयी. बहुत दिनों के बाद नया लंड मिला है, उत्सुकता बहुत थी और उम्मीद भी बहुत थी. पर जब मैंने इस ५’८” के आदमी का ५” का ही लंड देखा तो मन थोडा दब सा गया. खैर,

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रमेश जी तो तृप्त हो गए पर मेरी प्यास नहीं बुझी. तब पता चला की आदमी के कद से उसके लंड की लम्बाई नहीं पता चलती.

अब मेरी चाहत सामूहिक सम्भोग की थी. पंडित जी को बताया तो “नेकी और पूछ पूछ”. उनके कुछ ग्राहक, जो मेरे भी ग्राहक थे, उनकी सामूहिक सम्भोग की प्रबल इच्छा थी.
उस दिन रात में करीब ५ लोग आये थे. सब की उम्र कुछ ५० -५५ के आस पास ही होगी. इनका मानना था की पुरानी शराब की बात ही कुछ और है. इस दुनिया में अभी भी लोग तजुर्बे को तवज्जो देते हैं.
कमरे में सभी लोग मौजूद थे. पंडितजी हमेशा की तरह बाहर ही बैठे थे. ये बहुत दिनों से बाहर किवाड़ों की छेद से अन्दर का नज़र देख कर हस्तमैथुन कर लेते थे. नतीजा मैं बहुत दिनों से पंडित जी से नहीं चुदी थी.
सामूहिक सम्भोग तो सामूहिक बलात्कार जैसा हो रहा था. लोग मेरे कपडे खीच रहे थे. और मैं पगली एक एक कर के उनका लंड पजामे, या पैंट के ऊपर से सहला रही थी. दो लोगो का मैं हाथ से सहला रही थी और एक का जीभ से. इस बीच सारे जानवर मेरे कपडे फाड़ कर मुझे निवस्त्र कर चुके थे. मुझे नंगी देख कर उनका लंड और भी हुमचने लगा. बचे दो लोग में से एक मेरी चूत में ऊँगली करने लगा और एक मेरी गांड में. कमीनो ने एक एक ऊँगली कर के चार चार उँगलियाँ मेरी चूत और गांड में घुसा दी. मैं दर्द से चिल्लाने लगी और उन्हें लगा कि मुझे मजा आ रहा है. सब के सब अब नंगे हो गए. मुझे कुतिया बना कर एक ने अपना लंड मेरे मुंह में दे दिया जिससे मेरे चिल्लाना भी बंद हो गया. और दो लोगो का लंड और पजामे से बहार सक्षार्थ हो गया था. मैं उनका लंड हिलाने लगे. बाकी बचे दो लोग अभी भी मेरी ऊँगली कर रहे थे.

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अब इन लोगो ने अपनी स्थिति बदली और एक ने मुझे अपने लंड पर बिठा लिया. इसका लंड मेरे बुर पर फिट बैठ गया. अब चारों लोग एक एक कर के अपना लंड मेरे मुंह में देने लगे और एक – दो का मैं लंड हिला हिला रही थी.
फिर मुझे चित सुला कर एक ने मुझे चोदना शुरू किया और मैं निरंतर किसी को मुखमैथुन प्रदान कर रही थी और किसी दो को हस्तमैथुन. योनिमैथुन अभी भी चालू था. थोड़ी देर में एक झड गया और नया वाला तो और हरामी, उसे तो गुदामैथुन ही करना था. मुझे घोड़ी बना कर मेरी गांड चोदनी शुरू की और वो भी थोड़ी देर में झड गया. एक एक कर के सब तृप्त हो गए. पर मैं अभी तो पछाई नहीं थी. चौथा वाला मुझे थोडा करीब ले कर आया था पर वक़्त से पहले ही झड गया.
सब लोग पंडितजी को पैसे दे कर अपनी पतलून ले कर विदा हो गए. मैं अभी तक नंगी ही बैठी थी. पंडितजी अन्दर आते हैं. मुझे नंगे देख कर कहते हैं “रानी ये क्या? क्यों मजा नहीं आया?”
“जानू तुम्हारी वाली बात ही कुछ और है”
पंडितजी तो इस बात के लिए तैयार ही नहीं थे, मुझे ही कुछ करना पड़ेगा.
मैंने पंडितजी का लंड पर हाथ लगाया, जो सोया हुआ था. धीरे धीरे सहलना शुरू किया. फिर घुटनों के बल बैठ कर धोती के ऊपर से चाटने लगी. उनके पिछवाड़े से धोती की गाँठ खोली और आगे से दूसरा बंधन खोल दिया. पंडितजी अब चड्डी में थे. ऐसे जब उनका मन होता है तो वो बिना चड्डी के ही धोती पहनते हैं पर आज बात ही दूसरी थी. मेरा हाथ पड़ते ही उनका लंड खड़ा होने लगा. उनके कमर से धीरे धीरे चड्डी सरकाई और उफनते लंड को अपने मुंह में ले लिया. कितनो को सोया लंड मेरे मुंह में आकर सांप हो जाता है और फिर ये तो पंडित जी थे. उनके लंड को लोहा बनने में ज्यादा समय नहीं लगा.

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