सफेद लिबास मे सुंदर लड़की


कमरे में अब पूरी तरह अंधेरा था. बस हम दोनो के चूमने की आवाज़, कपड़ो की सरसराहट और भारी साँसों के अलावा और कोई आवाज़ नही थी.

पहाड़ों में शाम ढल जाने के बाद एक अजीब सा सन्नाटा फेल जाता है. दूर दूर तक सिर्फ़ हवा और किसी जानवर के चिल्लाने की आवाज़ को छ्चोड़कर और कुच्छ सुनाई नही पड़ता. कुच्छ को ये सन्नाटा बड़ा आरामदेह लगता है और कुच्छ को
ये सन्नाटा रुलाने की ताक़त भी रखता है. उस वक़्त भी यही आलम था. बाहर पूरी तरह अजीब सी खामोशी थी.

जैसे पूरी क़ायनत खामोश खड़ी हम दोनो के मिलन की गवाह बन रही हो. दिल की धड़कन इस तरह तेज़ हो चली थी के मुझे लग रहा था के कहीं कोई शोर ना सुन ले.

मेरा दिमाग़ कुन्द पड़ चुका था. आगे बढ़ने का ख्याल भी मेरे दिमाग़ में नही आ रहा था. उस पर चढ़ा बस उसको चूमे जा रहा था.

तभी उसने मेरा एक हाथ पकड़ा और अपने गले से हटाते हुए धीरे से नीचे लाई और अपनी एक छाती पर रख दिया.

एक बड़ा सा नरम गुदाज़ अंग मेरी हथेली में आ गया.

“इतने बड़े” ये पहला ख्याल था जो मेरे दिमाग़ में आया था. उसको पहली बार देख कर ये अंदाज़ा हो ही नही सकता था के उसकी चूचियाँ इतनी बड़ी बड़ी हैं.

“बड़ी पसंद है ना आपको?” उसने धीरे से मेरी कान में कहा.

और ये सच भी था. अपनी लाइफ में काई ऐसी लड़कियाँ जो मुझपर फिदा थी उनको मैने इसलिए रिजेक्ट किया था क्यूंकी उनकी चूचियाँ बड़ी बड़ी नही थी. मेरे हिसाब से एक औरत की सबसे पहली पहचान थी उसकी चूचियाँ और अगर वो ही औरत होने की गवाही ना दें तो फिर क्या फायडा.

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“हां” मैने हाँफती हुई आवाज़ में कहा और अपने हाथ में आए उस बड़े से अंग को धीरे धीरे दबाने लगा. तब भी मेरे दिमाग़ में ये नही आया के दूसरी चूची भी पकड़ लूँ और वो जैसे मेरा दिमाग़ पढ़ रही थी. उसने मेरा दूसरा हाथ भी पकड़ा और अपनी दूसरी चूची पर रख दिया.

“ज़ोर ज़ोर से दबाओ. मसल डालो”

और मेरे लिए शायद इतना इशारा ही काफ़ी था. मैने उसकी चूचियों को जानवर की तरह मसलना शुरू कर दिया और उसके गले पर बेतहाशा चूमने लगा. कोई और लड़की होती तो शायद इस तरह चूची दबाए जाने पर दर्द से बिलबिला पड़ती पर उसने चूं तक नही करी.

जब उसने देखा के मैं बस उसकी गले पर चूम रहा हूँ तो उसने मेरा सर पकड़ा और अपनी चूचियों की तरफ धकेला.

दबाए जाने के कारण दोनो चूचियो का काफ़ी हिस्सा कमीज़ के उपेर से बाहर को निकल रहा था और मेरे होंठ सीधा वहीं जाकर रुके. मैने नीचे से चूचियों को उपेर की ओर दबाया ताकि वो और कमीज़ के बाहर आएँ और उनके उपेर अपने होंठ और अपनी जीभ फिराने लगा.

उसको इस बात का एहसास हो चुका था के मैं दबा दबा कर उसकी कमीज़ के गले से उसकी चूचियाँ जितनी हो सकें बाहर निकलना चाह रहा हूँ.

“चाहिए?” उसने पुछा

“हां?” मैने चौंकते हुए पुछा

“ये चाहिए?”

कमरे में पूरा अंधेरा था और मैं उसको बिल्कुल देख नही सकता था, बस उसके जिस्म को महसूस कर सकता था पर फिर भी उसके पुच्छने के अंदाज़ से मैं समझ गया के वो अपनी चूचियों की बात कर रही थी.

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इससे पहले के मैं कोई जवाब देता, उसने मुझे पिछे को धकेला और उठकर बैठ गयी. उसके जिस्म की सरसराहट से मैं समझ गया था के वो अपनी कमीज़ उतार रही थी.

जब उसने फिर मेरे हाथ पकड़ कर अपनी चूचियों पर रखे तो इस बार मेरे हाथ को उसके नंगेपन का एहसास हुआ. उसने अपनी ब्रा भी उतार दी थी.

“किस रूप में चाहोगे मुझे?” उसने पुछा

मुझे सवाल समझ नही आया और इस बार भी उसने शायद मेरा दिमाग़ पढ़ लिया. इससे पहले के मैं उससे मतलब पुछ्ता वो खुद ही बोल पड़ी.

“किसे चोदना चाहोगे आज? जो चाहो मैं वही बनने को तैय्यार हूँ”

मुझे अब भी समझ नही आ रहा था.

“कहो तो तुम्हारी पड़ोसन, तुम्हारे दोस्त की बीवी, एक अंजान लड़की”

मुझे अब उसकी बात समझ आ रही थी. शहेर में हम इसे रोल प्लेयिंग कहते थे.

“कहो तो मैं एक रंडी बन जाऊं”

वो बोले जा रही थी.

“या कोई गंदी ख्वाहिश है तुम्हारी. अपनी माँ, या बहेन, या भाभी को चोदने की
ख्वाहिश?”

मैने फ़ौरन उसकी बात काटी.

“मेरी बीवी” पता नही कहा से मेरे दिमाग़ में ये ख्याल आया.

और इसके आगे मुझे कुच्छ कहने की ज़रूरत नही पड़ी.

“मेरे साथ आपकी पहली रात है पातिदेव. आपकी बीवी पूरी तरह आपकी है. जैसे चाहिए मज़ा लीजिए”

कहते हुए उसने मेरी कमीज़ के बटन खोलने शुरू कर दिए. मेरा दिमाग़ अब भी जैसे काम नही कर रहा था. जो कर रही थी, बस वो कर रही थी. लग रहा था जैसे वो मर्द हो और मैं औरत.

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